भारतीय विरासत और वैश्विक दृष्टि (कला, शिक्षा, साहित्य व फैशन का समकालीन परिप्रेक्ष्य) - Hardback ISBN: 978-81-991082-0-2
भारतीय संस्कृति और विरासत विश्व की सबसे प्राचीन, समृद्ध और जीवनदायी धरोहरों में से एक है। यह केवल हमारे इतिहास का गौरव नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की प्रेरणा भी है। भारत की कला, शिक्षा, साहित्य और फैशन ने समय-समय पर अपने बहुआयामी स्वरूप से समाज को दिशा दी है और आज भी यह अपनी वैश्विक पहचान बनाए हुए है। जब हम “भारतीय विरासत और वैश्विक दृष्टि” की बात करते हैं, तो यह केवल हमारे अतीत का स्मरण नहीं, बल्कि आधुनिक समय की चुनौतियों और अवसरों के बीच अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संकल्प भी है।
मेरे लिए यह अत्यंत हर्ष और गर्व का विषय है कि प्रस्तुत पुस्तक भारतीय विरासत और वैश्विक दृष्टि (कला, शिक्षा, साहित्य एवं फैशन का समकालीन परिप्रेक्ष्य), शिवाग्र कला मंच के सहयोग से, पाठकों के समक्ष आ रही है। इस पुस्तक में लगभग 30 शोधार्थियों, शिक्षाविदों और कलाचार्यों के शोधपत्र संकलित किए गए हैं, जो विविध विषयों पर गहन अध्ययन, विचार एवं दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं। यह प्रयास केवल शोध को संकलित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन तमाम बौद्धिक यात्राओं का भी प्रमाण है, जो हमारे युवा शोधार्थी और विद्वान भारतीय परंपरा को आधुनिक संदर्भों में समझने और प्रस्तुत करने के लिए कर रहे हैं। कला और साहित्य समाज का दर्पण हैं। शिक्षा उसका आधार है और फैशन उसका जीवंत रूप। इन सभी आयामों का संगम हमारी संस्कृति को एक अनूठी पहचान देता है। जब हम इनका अध्ययन वैश्विक दृष्टि से करते हैं, तो पाते हैं कि भारतीय संस्कृति की जड़ें जितनी गहरी हैं, उतनी ही लचीली भी हैं। यह न केवल परंपराओं को सहेजती है, बल्कि आधुनिकता को आत्मसात कर विश्व पटल पर अपनी प्रासंगिकता बनाए रखती है। इस पुस्तक का उद्देश्य भी यही है—पाठकों को यह अनुभव कराना कि भारतीय कला और संस्कृति किस प्रकार आधुनिक शिक्षा, साहित्य और फैशन से जुड़कर नए आयाम रच रही है। इस संकलन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें विविध विचारों और दृष्टिकोणों का संगम है। युवा शोधार्थियों की जिज्ञासा, शिक्षाविदों का अनुभव और कलाचार्यों की सृजनात्मक दृष्टि—इन सबका समन्वय इसे एक विशिष्ट कृति बनाता है। मेरा विश्वास है कि यह पुस्तक न केवल विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी होगी, बल्कि कला, संस्कृति और समाज से जुड़े हर पाठक को नई दिशा और प्रेरणा देगी।
मैं इस अवसर पर शिवाग्र कला मंच का विशेष आभार प्रकट करता हूँ, जिन्होंने इस सामूहिक प्रयास को साकार रूप देने में सहयोग प्रदान किया। साथ ही, सभी योगदानकर्ताओं का हृदय से अभिनंदन करता हूँ, जिनके श्रम और चिंतन से यह संकलन संभव हुआ।
मेरी कामना है कि यह पुस्तक भारतीय विरासत के संरक्षण और प्रसार में एक सेतु का कार्य करे तथा वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत की गौरवशाली परंपरा को और अधिक सशक्त बनाए।
डॉ. मंतोष यादव
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